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थेम्स वाटर संकट ब्रिटेन में बाजार समाधानों की वैधता को चुनौती दे रहा है

Financial Times Companies •
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सरकार और थेम्स वाटर के लेनदारों के बीच चल रहा गतिरोध ब्रिटिश राजनीति को कई लोगों के समझ से अधिक आकार दे रहा है। लेनदार एंडी बर्नहम से स्पष्टता मांग रहे हैं कि संभावित पुनः राष्ट्रीकरण योजनाओं के बारे में, जबकि गिल प्लिमर और जिम पिकार्ड इस गतिरोध की रिपोर्ट कर रहे हैं। नीति का व्यापार-ऑफ सीधा है: कानूनी और वित्तीय रूप से, सरकार के लिए उपयोगिता के नकद समाप्त होने तक इंतजार करना आसान हो सकता है। राजनीतिक रूप से, बर्नहम के लिए कार्य करने का मजबूत प्रोत्साहन है, क्योंकि वह इस संकट का उपयोग अपने लेबर पार्टी के पूर्ववर्ती से बदलाव दिखाने के लिए कर रहा है। क्या अप्रकाशित रहा है कि थेम्स वाटर की स्थिति बाजार समाधानों के लिए अधिक तर्क को कैसे कमजोर कर रही है। ब्रिटेन में निजीकरण अब व्यापक रूप से पानी उद्योग जैसी विफलताओं के समान माना जाता है, जिसे गलत कारणों के लिए निजीकृत किया गया था—जैसे स्थानीय सरकार की राजस्व आधार को कमजोर करना। यदि थेम्स वाटर के लिए एक नया दृष्टिकोण काम करता है, तो यह आगे बढ़कर 1980 और 1990 के दशक की निजीकरण को लाभदायक मानने की धारणा को और चुनौती देगा।同时, एंडी बर्नहम यूरोपीय संघ के साथ संबंधों को सुधारकर और व्यावसायिक लागत कम करके विकास को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता है, जिसमें ऊर्जा-ग्रिड कनेक्टिविटी एक मुख्य फोकस है। वेयमो और वेवे द्वारा रोबोटैक्सी काrollout भी सरकार के लक्ष्यों से पीछे चल रहा है।

मुख्य संस्थाएं: कंपनियां: थीम्स वाटर, वेयमो, वेवे | व्यक्ति: एंडी बर्नहम, रौला खालाफ, स्टीफन बुश, गिल प्लिमर, जिम पिकार्ड, जॉर्जिना क्वाच, गिलियन टेट, मार्गरेट थैचर | स्थान: ब्रिटेन, लंदन, यूरोपीय संघ, नोबल रोट, क्वो वाडिस, थीम्स

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न: थीम्स वाटर संकट का ब्रिटेन में निजीकरण पर मुख्य प्रभाव क्या है?

संकट बाजार समाधानों के पक्ष में तर्क को कमजोर कर रहा है क्योंकि यह दिखा रहा है कि पानी क्षेत्र में निजीकरण विफल रहा है, जिससे 1980 और 1990 के दशक के व्यापक निजीकरण की सफलता पर संदेह पैदा हो रहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न: थीम्स वाटर संकट का ब्रिटेन में निजीकरण पर मुख्य प्रभाव क्या है?

उत्तर: संकट बाजार समाधानों के पक्ष में तर्क को कमजोर कर रहा है क्योंकि यह दिखा रहा है कि पानी क्षेत्र में निजीकरण विफल रहा है, जिससे 1980 और 1990 के दशक के व्यापक निजीकरण की सफलता पर संदेह पैदा हो रहा है।